क्या "अली के दर का कुत्ता" कह देने से कोई हज़रत अली वाला बन जाता है? आजकल कुछ ख़तीब और तक़रीर करने वाले बड़े जोश के साथ कहते हैं: "मैं अली के दर का कुत्ता हूँ।" "मैं अली का ग़ुलाम हूँ।" "मैं अहले बैत का सच्चा चाहने वाला हूँ।" लेकिन जब मुहर्रम आता है तो यही लोग ढोल-ताशों, बाजों और तरह-तरह की रस्मों की हिमायत करने लगते हैं, जिनका न क़ुरआन में कोई सबूत मिलता है, न हदीस में और न ही हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की तालीमात में। जब उनसे दलील माँगी जाती है तो कुछ लोग फ़तावा आलमगीरी का ग़लत हवाला देकर अवाम को गुमराह करने की कोशिश करते हैं। फ़तावा आलमगीरी का असली मसला फ़तावा आलमगीरी में यह इबारत मौजूद है: "وسئل أبو يوسف رحمه الله عن الدف في غير النكاح إذا ضربته المرأة للصبي، فقال: لا أرى به بأساً، وإنما أكره ما كان من اللهو الفاحش الذي يهيج الناس على الفساد." इसका मतलब यह है: "इमाम अबू यूसुफ रहमतुल्लाहि अलैह से निकाह के अलावा उस दफ़ के बारे में पूछा गया जिसे कोई औरत बच्चे के लिए बजाए, तो आपने फ़रमाया कि मैं इसमें कोई हरज नहीं समझता। हाँ, उस ख...