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जकात किसे देनी चाहिए?

​माहे रमजान मुबारक कि आमद करीब है और  इस माह मे हर नेकी का सवाब डबल हो जाता है मुसलमान  इसी माह मे अपने माल कि जकात निकालते है जकात  इस्लाम का एक रुकन भी है कामयाब वही लोग होते है जो अपने माल की जकात  अदा करते है अल्लाह पाक फरमाता! और वोह जो जकात देने का काम करने वाले है  (कूर्आन पाक )  इस  आयत मे कामयाबी पाने वाले अहल  इमान कि निशानी यह बताइ है के वोह जकात निकालने वाले है!   जकात के फजाइल 

हदिस मे है जिस ने अपने माल की जकात  अदा कर दि तो बेशक  उस के माल का खतरा टल गया  और फरमाया के जकात दे कर  अपने मालो को मजबूत किलो मे कर लो और फरमाया के अपने माल की जकात निकाल के वोह पाक करने वाली है तुझे पाक कर देगी बुखारी शररिफ मे है अल्लाह पाक ने माल दिया और वोह  उस कि जकात न निकाले तो कयामत के दिन माल गंजे सांप कि सूरत मे कर दिया जाएगा वोह सांप  उस के गले मे तोक  (हार ) बना कर डाला जाएगा फिर  उसे अजाब होगा (सही बुखारी ) जकात निकलने से माल कम नही होता बल्कि  और बढता रहता है अल्लाह पाक फरमाता है!  और जो कुछ तुम खर्च करोगे अल्लाह पाक उस कि जगह  और देगा और वोह बेतरह रोजी देने वाला है  ( कूर्आन पाक ) जकात उन के हकदारो को देने से गरीब मुसलमान कि दुऑए भी मिलती है और किसी मुसलमान के दिल को खूश करने से बढ़कर कोइ नेकी नही हो सकती रसूल करिम अलैहि सलाम ने फरमाया  अल्लाह के नजदीक फराइज कि अदायगी के बाद सब से  अफजल  अम्ल मुसलमान के दिल मे खुशी दाखिल करना है और फरमाया बेशक मगफिरत को वाजिब कर देने वाली चीजो मे से अपने मुसलमान भाई का दिल खूश करना भि है सयदना बशर हाफी रहमतूल्ल्ह  अलैहि का कोल है के किसी मुसलमान का दिल खूश करने सौ नफली हज से बेहतर है  (माहनामा फैजाने मदिना ) नोट मुसलमान के साथ भलाई करने का और  उस कि मदद करने का बहूत ज्यादा सवाब है देखे हमारी किताब इत्हाद जिन्दगी है इखतलाफ मोत है  उस किताब मे हमने तफसिल से लिखा है यह गुजराती मे है और pdf मे मिल जाएगी अब यह समझना जरूरी है कि जकात किसे देनी है और किसे नही जब जकात  उस के हकदार को नही दि तो आप कि जकात  अदा नही होगी और गुनहगार मुसतहिक नार होगे 

जकात के हकदार कोन है  अल्लाह पाक फरमाता 

Surat No 9 : سورة التوبة - Ayat No 60 


اِنَّمَا الصَّدَقٰتُ لِلۡفُقَرَآءِ وَ الۡمَسٰکِیۡنِ وَ  الۡعٰمِلِیۡنَ عَلَیۡہَا وَ الۡمُؤَلَّفَۃِ قُلُوۡبُہُمۡ وَ فِی الرِّقَابِ وَ الۡغٰرِمِیۡنَ وَ فِیۡ سَبِیۡلِ اللّٰہِ وَ ابۡنِ السَّبِیۡلِ ؕ فَرِیۡضَۃً مِّنَ  اللّٰہِ ؕ وَ اللّٰہُ  عَلِیۡمٌ  حَکِیۡمٌ ﴿۶۰﴾


ये सदक़े तो अस्ल में फ़क़ीरों [61] और मिसकीनों [62] के लिए हैं और उन लोगों के लिए जो सदक़ों के काम पर मुक़र्रर हो [63], और उनके लिए जिनका मन मोहना हो [64], साथ ही यह गरदनों के छुड़ाने [65] और क़र्ज़दारों की मदद करने में [66] और अल्लाह के रास्ते में [67] और मुसाफ़िर की मदद में [68] इस्तेमाल करने के लिए हैं. एक फ़रीज़ा है अल्लाह की तरफ़ से, और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला और गहरी सूझ-बूझवाला है.(कूर्आन पाक ) इस आयत मे जकात के हकदार बताए गए है 

यानी 8  किस्म के लोग जकात लेने के हकदार है उनमे से 1 है फकिर  फकीर वोह नही जो हमारे यहा एक कोम फकिर है जो यह कहते है के जकात लेना हमारा हक है हालांकि हरगिज  इन का कोई हक नही है यह लोग  अक्सर जकात लेने के नही बल्कि जकात देने के हकदार है हा अगर वाकई मे कोई इतना गरीब हो तो वोह ले सकता है पहले यह समझ ले के हकीकत मे फकिर किसे कहते है शरियत मे फकिर  उसे कहते है जिस के पास माल निसाब से कम हो यानी उस के पास साढे सात तोला सोना या साढे बावन तोला चांदी के जेवरात या इस कदर रूपया हो के वोह चाहे तो दोनो मे से कोई एक चिज खरीद सकते हो वोह  आदमी हकिकी फकिर नही है उसे जकात लेना हराम है  और  एसो को देने से जकात  अदा नही होगी देने वाला गुनहगार होगा अस्ल मे फकिर वोह है जिस के पास निसाब जितना माल न हो अब  अगर वोह जात का पठान या शेख क्यू न हो उसे जकात दि जा सकती है और एक है कर्ज दार जो के बगैर किसी गुनाह के उस पर कर्ज हो गया है और न  इतना माल हो के जिस से कर्ज  अदा कर सके एसे लोगो को जकात देना जाइज है ताकी वोह कर्ज  अदा कर सके  इस के अलावा जो सूरते कूर्आन मे बयान कि गई है वोह सुरते फिलहाल हमारे यहा नही पाई जाती है उस लिए उस पर हमने नही लिखा अगर कोई सब सुरते जानना चाहता है तो हमारी किताब जकात के मुसतहिक कोन  उर्दू को देखे 

लिहाजा भिक मांगने वाले फकिरो को जकात न दे अगर देना है तो पहले तहकिक कर ले के यह फकिर  इतना गरीब है या नही हम ने बहुत से फकिरो को देखा है जो माज  अल्लाह सूद पर पैसे देते है गाडी बंगला जमिन सब है फिर भी रमजान मे भिक मांगने निकल जाते है एसे फकिरो को जकात देना गुनाह है जकात के सब से बेहतर हकदार आप के रिश्तेदार है फिर पडोसी फिर  अपने गांव के गरीब मुसलमान फिर शहर के रहने वाले गरीब मुसलमान है खबरदार रिश्तेदार गरिब हो तो पहले उन्हे दे रसूल करिम अलैहि सलाम ने फरमाया  ए उमते मूहम्मद कशम है उस कि जिस ने मुझे हक के साथ भेजा अल्लाह पाक  उस  आदमी का शदका  (जकात ) कबूल नही फरमाता जिस के रिश्तेदार गरिब हो और यह दुसरो को दे कशम है उस कि जिस के कब्जे मे मेरी जान है अल्लाह पाक उस कि तरफ कयामत के दिन  (रहमत ) कि नजर न फरमाएग  (बाहरे शरियत भाग 1 पेज 444 )

लिहाजा जकात पहले अपने रिश्तेदार को देना चाहिए रसूल करिम अलैहि सलाम ने फरमाया रिश्तेदारो को देने मे दो सवाब है एक शदका करने का और दूसरा सिला रहमी करने का  (यानी उस के साथ भलाई करने का भी सवाब है ) और रिश्तेदार के बाद जकात का सबसे बेहतर हकदार  आलिम है  हजरत मुफ्ती अमजद अली रहमतूल्ल्ह अलैहि फरमाते है  आलिम गरिब हो तो उस को  (जकात ) देना जाहिल को देने से अफजल है मगर  आलिम को देने मे उस का लिहाज रखे उस के मर्तबा का ख्याल रखे अदब के साथ दे माज  अल्लाह  आलिम दिन कि हकारत दिल मे  आई तो हलाकत है सख्त हलाकत है  (यानी जब  आलिम को जकात दे तो दिल मे यह नियत रखे के मै आलिम कि मदद करता हू उन कि परेशानी दूर करना है तो उस का डबल सवाब मिलेगा दिल मे कोई बूरा ख्याल न  आने दे के मौलवी हो कर जकात खाता है एसा ख्याल  आप के लिए खतरनाक हो सकता है कही इमान बर्बाद न हो जाए ) इस दौर मे मुझे आलिम से ज्यादा कोई गरिब नजर नही आता मुसलमान खूद जानता है कि हम  अपने  आलिम को कितनी तनख्वाह देते है आलिम कि तनख्वाह से तो आप लोगो के चाय पानी का भि खर्च नही चलता है तो इतनी कम तनख्वाह मे आलिम का गुजारा केसे होता होगा कभी  आप ने गौर किया मालदार लोगो कयामत के दिन तुम से सवाल होगा के अपने गाव या शहर मे एक  आलिम जरूरतमंद होते हुए भी तुम ने उसे किया दिया होना तो यह चाहिए था आप  उस को  जकात के अलावा रकम देते और  उस को जिदंगी गुजारने मे आसानी करते अगर यह नही कर सकते तो तुम्हारी कम नसीबी है कम से कम जकात से तो उसे देते जिस का हुक्म  अल्लाह ने दिया है मुसलमानो जरा गौर तो करो वोह  आलिम जो तुम्हारे पैदा होने से लेकर कब्र तक तुम्हारी खिदमत मे रहता है उस के साथ तुम ने क्या किया आलिम का एहसान है तुम पर के वोह दिन रात मे पाच मर्तबा तुम्हारे लिए नमाजो मे दुआ करता रहता है  उस का ख्याल रखना चाहिए और फिर जकात आलिम को देना डबल सवाब है रसूल करिम अलैहि सलाम ने फरमाया तू सिर्फ परेहजगारो का खाना खा और तेरा खाना भी परहेजगार हि खाए  (अब खूद गौर करे आलिम से ज्यादा परहेजगार कोन )  हजरत  इमाम गजाली रहमतूल्ल्ह अलैहि फरमाते है जिसे तु जकात दे वोह  अहले  इल्म  ( आलिम ) हो क्युकी इल्म पर  उस कि मदद करना और  इल्म सब से अफजल  इबादत है हजरत  अब्दुल्ला बिन मुबारक रहमतूल्ल्ह अलैहि  अपना शदका अहले इल्म  ( आलिम ) मे तकसिम फरमाते आप फरमाते है मै मकाम नबूवत के बाद उलमा के मकाम के सिवा किसी का मकाम  अफजल नही समझता  (अयाउल  उलूम भाग 1 पेज 667 )

अब  यह समझना जरूरी है कि  अपने रिश्तेदार और  आलिम को जकात देते वक्त यह न कहा जाए के यह जकात है वर्ना यह लोग हकदार होते हुए भी लेने मे शरम महसूस करते है लिहाजा इन को जकात देते वक्त सिर्फ दिल मे नियत जकात कि कर ले जुबान से कुछ  और कहा मसलन् दिल मे जकात का इरादा किया और जुबान से हदिया या कर्ज कहा तो भी जकात अदा हो गई  (फतावा रजविया भाग 10 पेज 44 ) फिर नियत सिर्फ देने वाले कि है लेने वाला कुछ भी समझे लिहाजा  अगर  इद के दिन  अपने रिश्तेदार या आलिम को जिन्हे जकात दि जा सकती हो कुछ हदिया इदी का नाम ले कर दिया  और  उन्होंने इदी समझ कर लिया तो आप कि जकात अदा हो गई  (फतावा रजविया भाग 10 पेज 67 )  नोट वोह लोग जो जकात के हकदार है मगर शर्म व हया से नही मांगते उन्हे बजाए जकात तोहफा हदिया हि के नाम से देना अफजल है  आजकल दिन के नाम पर  इदारे चलते है और उन के पास सालाना लाखो रुपये बचत होती है फिर भी इनका चन्दा जारी रहता है मुसलमानो को चाहे के जिस इदारे मे बचत है उन्हे न दे बल्कि  उन  इदारो को दे जो उन के पास बचत नही है आप कि जकात जमा करने के लिए नही है बल्कि हकदारो तक पहूचाना आप पर लाजिम है जकात के माल को जमा कर के रखना नही है बल्कि जरूरत मन्दो को देना वाजिब है सब से पहले जकात  अपने रिश्तेदार को दे फिर  अपनी मस्जिद के इमाम को देना चाहिए यह ज्यादा हकदार है  अलबत्ता  इमाम साहब को देने से पहले उन से इतना जरूर मालूम कर ले के हजरत क्या आप साहिब निसाब है अगर कहे नही है तो उन्ही कि खिदमत मे अदब के साथ हदिया वगैरह या कुछ भी नही कहे और  उन्हे जकात दे दे सिर्फ दिल मे नियत जकात कि कर ले  और  अगर  इमाम साहब कहे मै साहिब निसाब हू तो अब  उन्हे નાदे वर्ना जकात अदा नही होगी मगर हमारी तहकिक के मुताबिक 75%  फिसद  इमाम गरिब होते है जो जकात के हकदार है मगर शर्म व हया से सवाल नही करते लिहाजा जकात देने से पहले अपने गांव और शहर के  इमामो कि तहकिक जरूर कर ले जब तक  कोई आलिम जकात का हकदार मिल जाए तो सब से पहले उन्हे दे के आलिम को खूश करना भी बहुत सवाब का काम है 

अल्लाह पाक हम सब को सही समझ  अता फरमाए

मस्अला सयद साहब को जकात देना जाइज नही न  उन्हे लेना जाइज अगर कोई सयद साहब गरिब हो तो मुसलमानो तुम पर लाजिम है के सयद साहब कि मदद नजराना से करे आज जो कुछ  अल्लाह ने तुम्हे दिया है वोह सब  अहले बैत का शदका है अहले बैत से मोहब्बत  इमान कि निशानी है लिहाजा सयद साहब का भी खास ख्याल रखे 

मस्अला  रिश्तेदार और मिसकिन का खास ख्याल रखे सब से पहले उन्हे दे अल्लाह पाक फरमाता है 👉🏻 Surat No 30 : سورة الروم - Ayat No 38 


فَاٰتِ ذَاالۡقُرۡبٰی حَقَّہٗ  وَ الۡمِسۡکِیۡنَ وَ ابۡنَ‌السَّبِیۡلِ ؕ ذٰلِکَ خَیۡرٌ لِّلَّذِیۡنَ یُرِیۡدُوۡنَ وَجۡہَ اللّٰہِ ۫ وَ اُولٰٓئِکَ ہُمُ الۡمُفۡلِحُوۡنَ ﴿۳۸﴾


इसलिये (ऐ मोमिन) रिश्तेदार को उसका हक़ दे और मिस्कीन और मुसाफ़िर को (उसका हक़) ये तरीक़ा बेहतर है उन लोगों के लिये जो अल्लाह की ख़ुशनूदी चाहते हों, और वही फ़लाह पानेवाले हैं।

इस  आयत से मालूम हुआ जो अल्लाह को राजी करने के लिए खर्च करते है वोह सब से पहले  अपने रिश्तेदार और मिसकिन और मुसाफ़िर पर खर्च करते है इसी का बदला अल्लाह पाक  अपने फजल से और ज्यादा  अता फरमाएगा  लिहाजा जकात या शदका जिसे भी दे अल्लाह पाक कि रिजा के लिए दे न के दुनिया को दिखाने के लिए दे और न देकर किसी पर  एहसान जताए तुमने गरिब को दे कर कोई एहसान नही किया बल्कि  उस गरिब का तुम  एहसान मानो के उस ने शदका ले कर  तुम्हे बड़ी मुसीबत से बचाया है 

शदका दे कर गरीब पर  एहसान जताना हराम है  और शदका को बर्बाद कर देता है अल्लाह पाक फरमाता है 👉🏻Surat No 2 : سورة البقرة - Ayat No 264 


یٰۤاَیُّہَا الَّذِیۡنَ اٰمَنُوۡا لَا تُبۡطِلُوۡا صَدَقٰتِکُمۡ بِالۡمَنِّ وَ الۡاَذٰی ۙ کَالَّذِیۡ یُنۡفِقُ مَالَہٗ رِئَآءَ النَّاسِ وَ لَا یُؤۡمِنُ بِاللّٰہِ وَ الۡیَوۡمِ الۡاٰخِرِؕ فَمَثَلُہٗ  کَمَثَلِ صَفۡوَانٍ عَلَیۡہِ تُرَابٌ فَاَصَابَہٗ وَابِلٌ فَتَرَکَہٗ صَلۡدًا ؕ لَا  یَقۡدِرُوۡنَ عَلٰی شَیۡءٍ مِّمَّا کَسَبُوۡا ؕ وَ اللّٰہُ  لَا یَہۡدِی الۡقَوۡمَ الۡکٰفِرِیۡنَ ﴿۲۶۴﴾


ऐ ईमान लानेवालो ! अपने सदक़ों को एहसान जताकर और दुःख देकर उस आदमी की तरह मिट्टी में न मिला दो जो अपना माल सिर्फ़ लोगों के दिखाने को ख़र्च करता है और न अल्लाह पर ईमान रखता है, न आख़िरत पर।[303] उसके ख़र्च की मिसाल ऐसी है, जैसे एक चट्टान थी जिस पर मिट्टी की तह जमी हुई थी। उसपर जब ज़ोर की बारिश हुई तो सारी मिट्टी बह गई और साफ़ चट्टान की चट्टान रह गई।[304] ऐसे लोग अपनी नज़र में ख़ैरात करके जो नेकी कमाते हैं, उससे कुछ भी उनके हाथ नहीं आता और इनकार करनेवालों को सीधी राह दिखाना अल्लाह का दस्तूर नहीं है।

इस  आयत से  उन लोगो को नसीहत हासिल करना चाहिए जो दिखावा के लिए देते है ताकी लोग  उन कि वाह वाह करे और कुछ बदनसीब लेने वाले भी एसे होते है जो एसे लोगो की बेजा तारीफ कर के उन्हे गुमराह करते है हजरत मुफ्ती मुहम्मद कासिम साहब कादरी फरमाते है जकात या शदका सिर्फ  अल्लाह पाक कि रिजा के लिए दे ताकी उस पर  उन्हे ज्यादा सवाब मिले और यह मकसद न हो के उस के बदले जकात लेने वाला उन कि खूब  आओ भगत करे  उन के खिदमत गार बन कर रहे और  उनका हर काम  एक हि इशारे पर बजा लाए हर वक्त  उन का एहसान मन्द रहे लोगो मे उनके नाम का खूब चर्चा हो और लोग  उन कि तारिफो के पूल बांधे अगर यही मकसद है तो सवाब दूर कि बात है  उल्टा  उनके गुनाह का मिटर तेज होता है  (तफसिर सिरात जिनान ) आजकल हालात  एसे ही है अक्सर मालदार लोग  एसी जगह पर खर्च करते है जहा उन की तारिफे हो और कुछ  इदारे वाले भी एसे है जो उनके पक्के गुलाम कि तरह  उन कि खिदमत मे हाजिर रहते है उन  इदारो मे एक आलिम कि कोई हैसियत नही मगर मालदार लोगो कि वहा बडी शान है अगर कोई आलिम किसी बच्चे के दाखिले के लिए कहे तो जगह खाली नही होती मगर कोई धनी का फोन जाए दो पूरा इदारा खाली है जितने दाखले चाहे मिल जाएगें हालांकि  दिनी इदारो का कानून  अमिर गरिब सब के लिए एक होना चाहिए और हककी इदारे का मकसद तो यह होना चाहिए के उस मे गरिब के बच्चे पर ज्यादा तवज्जो होनी चाहिए क्योंकि लोग तुम्हे जकात  इसी लिए तो देते है के गरिब का बच्चा दिनी तालिम से आरासता हो अमिर के बच्चे को अगर दाखिला न भि मिला तो कोई फर्क नही पडेगा के उस कि हैसियत है के वोह प्राइवेट मे भी पढा सकता है तुम्हे अल्लाह का डर होना चाहिए गरिबो के नाम से जकात लि जाती है और  उन के बच्चे को जरूरत हो तो जगह खाली नही वाकई जगह खाली न हो तो कोई हर्ज नही मगर सेठ साहब के फोन करने से फिर जगह खाली केसे हो जाती है?  मुसलमानो समझदार के लिए इशारा काफी है अपना शदका खैरात सोच समझ कर देना कुछ जहा दिनी तालिम होती है वही दे  *मुफ्ती  इदारा एम जे अकबरी*

تبصرے

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