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हूसैनी ब्राम्हण का किस्सा


(क्या कर्बला में हुसैनी ब्राह्मण थे?)
जहाँ वाक़ियात-ए-कर्बला में बहुत से मनगढ़ंत और झूठे किस्से मशहूर कर दिए गए हैं, उन्हीं में से एक किस्सा यह भी है कि कर्बला में यज़ीदी फ़ौज से लड़ने के लिए कुछ "हुसैनी ब्राह्मण" भी गए थे।
यह वाक़िआ कुछ इस तरह बयान किया जाता है:
एक दत्त हुसैनी ब्राह्मण, राहब दत्त नाम का व्यक्ति, अपने सात बेटों को कर्बला में क़ुर्बान कर देता है और हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत के बाद मुख़्तार सक़फ़ी के साथ मिलकर यज़ीदियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिस्सा लेता है।
कहा जाता है कि राहब सिंह दत्त हिंदुस्तान के उत्तरी इलाक़े (पंजाब-हरियाणा) के जाट ब्राह्मण थे और अरब में व्यापार की ग़रज़ से रहते थे। इन जाट ब्राह्मणों को "मोहीयाल" कहा जाता था। ये लोग पढ़े-लिखे होते थे और राजाओं के सलाहकार या राजगुरु के रूप में सेवाएँ देते थे।
दावा किया जाता है कि राहब दत्त की कोई औलाद नहीं थी। एक दिन वह हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िदमत में हाज़िर हुए और औलाद के लिए दुआ की दरख़्वास्त की। इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया कि उनकी तक़दीर में औलाद नहीं लिखी गई है। यह सुनकर वह रोने लगे और बेहोश हो गए।
फिर कहा जाता है कि इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु को उन पर रहम आया और आपने उन्हें एक बेटे की बशारत दी। इस पर एक बुज़ुर्ग ने एतराज़ किया कि आप अल्लाह की मशीयत में दख़ल दे रहे हैं। फिर आपने एक और बेटे की बशारत दी। बुज़ुर्ग ने फिर एतराज़ किया। इस तरह सात बार एतराज़ हुआ और सात बेटों की बशारत दी गई।
आगे दावा किया जाता है कि राहब दत्त को वास्तव में सात बेटे हुए और वे सब इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु के मुरीद और अकीदतमंद बन गए।
फिर कहा जाता है कि जब कर्बला का वाक़िआ पेश आया तो राहब दत्त अपने सातों बेटों के साथ कूफ़ा की तरफ़ रवाना हुए। एक रिवायत के मुताबिक़ वे कर्बला पहुँचने तक इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु शहीद हो चुके थे, जबकि दूसरी रिवायत के अनुसार उनके सातों बेटे कर्बला में शहीद हुए।
इसके बाद यह भी बयान किया जाता है कि राहब दत्त की मुलाक़ात हज़रत सैय्यिदा ज़ैनब रज़ियल्लाहु अन्हा से हुई। उन्होंने अपने बेटों की शहादत का ज़िक्र किया तो हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहु अन्हा ने फ़रमाया: "आज से तुम हुसैनी ब्राह्मण कहलाओगे।"
फिर यह भी कहा जाता है कि इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत के बाद राहब दत्त ने मुख़्तार सक़फ़ी के साथ मिलकर यज़ीदियों से बदला लिया और उसके बाद हिंदुस्तान वापस आ गए।
कुछ ख़तीब तो इससे भी आगे बढ़कर यह दावा करते हैं कि दस हज़ार हुसैनी ब्राह्मण कर्बला में शहीद हुए थे और इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने उनकी कटी हुई गर्दनों को जोड़कर उन्हें ज़िंदा कर दिया था, जिनके निशान आज भी मौजूद हैं।
हक़ीक़त क्या है?
यह पूरा क़िस्सा झूठ, मनगढ़ंत और बेबुनियाद मालूम होता है। इसका किसी भी मुस्तनद और मक़बूल इस्लामी किताब में कोई उल्लेख नहीं मिलता।
पहली बात यह कि इस वाक़िए का कोई भरोसेमंद इस्लामी स्रोत मौजूद नहीं।
दूसरी बात यह कि इस कहानी को सबसे पहले बयान करने वाला कौन है, इसका भी कोई सही पता नहीं।
तीसरी बात यह कि यदि मान भी लिया जाए कि इसे राहब दत्त ने बयान किया, तब भी वह मुसलमान नहीं था, इसलिए उसकी अकेली रिवायत शरई तौर पर हुज्जत नहीं बन सकती।
इसके अलावा कहानी के अंदर भी अनेक अक़्ली और शरई ख़राबियाँ मौजूद हैं।
कहानी में कहा गया है कि पहले इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया कि उसकी तक़दीर में औलाद नहीं है, फिर बार-बार औलाद की बशारत दी। जबकि तक़दीर-ए-इलाही के बारे में अहले सुन्नत का अक़ीदा यह है कि जो अल्लाह तआला ने मुक़द्दर फ़रमा दिया है वह होकर रहेगा।
फिर यह कहना कि एक बुज़ुर्ग बार-बार एतराज़ करते रहे कि आप अल्लाह की मशीयत के ख़िलाफ़ फ़रमा रहे हैं और इसके बावजूद इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु उसी बात को दोहराते रहे, यह भी इमामे आली मक़ाम रज़ियल्लाहु अन्हु की शान में एक अनुचित बात है।
इसी तरह यह दावा कि इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने कटी हुई गर्दनों को जोड़कर लोगों को ज़िंदा कर दिया, किसी भी मुस्तनद इस्लामी किताब से साबित नहीं है।
जब कर्बला में आपके अपने जाँनिसार साथी और अहले बैत के अफ़राद शहीद हुए, तब ऐसी किसी घटना का उल्लेख किसी सही तारीखी या हदीसी किताब में नहीं मिलता।
ख़ुलासा
"हुसैनी ब्राह्मण" के नाम से मशहूर यह क़िस्सा किसी भी मुस्तनद इस्लामी किताब से साबित नहीं है। इसके समर्थन में न कोई सही सनद मौजूद है और न ही कोई विश्वसनीय तारीखी प्रमाण।
हाँ, इंटरनेट और विकिपीडिया आदि पर इस विषय का उल्लेख मिलता है, लेकिन वहाँ भी किसी भरोसेमंद इस्लामी स्रोत से इसका प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया है।
इसलिए ऐसे क़िस्सों को बिना तहक़ीक़ के बयान करना और लोगों में फैलाना उचित नहीं। मुसलमानों को चाहिए कि कर्बला और अहले बैत से संबंधित केवल वही बातें बयान करें जो मुस्तनद और विश्वसनीय स्रोतों से साबित हों।
کربلا کی تحقیق و تردید صفحہ 64

अनुवादक:
दारुल इफ्ता गुलज़ारे तैयबा टीम

📚 दारुल इफ्ता गुलज़ारे तैयबा
शरई मसाइल तहकीक़ सेंटर

ज़ेरे निगरानी: मुफ्ती अबू अहमद एम. जे. अकबरी साहब

✍️ हिंदी अनुवाद:
दारुल इफ्ता गुलज़ारे तैयबा टीम

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