[امام مسلم کے بچوں کا واقعہ]
دارالافتاء گلزار طیبہ
(ابراہیم و محمد ابنانِ مسلم بن عقیل رضی اللہ عنہما کی شہادت ایک افسانہ ہے)
इब्राहीम व मुहम्मद की कूफ़ा जाते हुए रास्ते में शहादत का वाक़िआ बिल्कुल ग़ैर-मुअतबर है। तारीख़ की किसी भी मुअतबर किताब में यह वाक़िआ मज़कूर नहीं है। इमाम मुस्लिम के बच्चों का यह अफ़साना सबसे पहले अअसम अल-कूफ़ी ने अपनी किताब अल-फुतूह में लिखा, मगर उसने भी सिर्फ़ उनके क़ैदी होने को बयान किया है। अलबत्ता मुल्ला हुसैन काशिफ़ी ने रौज़तुश्शुहदा में उनकी शहादत का शोर मचाया। यही पहला माख़ज़ है जिसमें इब्राहीम व मुहम्मद की शहादत का बयान मिलता है, जबकि इस अफ़साने को ख़ुद मुअतबर शिया मुसन्निफ़ीन ने भी बे-बुनियाद क़रार देकर रद्द कर दिया है।
मिर्ज़ा तकी अपनी किताब नासिखुत्तवारीख़ में लिखता है:
"मक्शूफ़ बाद कि शहादत मुहम्मद व इब्राहीम पिसरहाए मुस्लिम कमतर दर किताब पेशीनियाँ दीदा अम, इल्ला आँ कि अअसम (अअसम) कूफ़ी मी गोयद कि बाद अज़ क़त्ले हुसैन चूँ अह्ले बैत रा असीर करदंद, पिसरहाए मुस्लिम सगीर दरमियान असरा बूदंद। इब्ने ज़ियाद ईशाँ रा बगिरिफ़्त व महबूस नमूद। नख़ुस्तीं दर बारे शहादते ईशाँ दर किताब रौज़तुश्शुहदा मस्तूर अस्त, व मन ईं क़िस्सा रा अज़ रौज़तुश्शुहदा मुन्तख़ब मी दारम, व क़िस्सा-ए ईशाँ मुअतबर नीस्त।"
(नासिखुत्तवारीख़, जि. 2, पृ. 110)
इमाम मुस्लिम के साहबज़ादों की शहादत का वाक़िआ पहली किताबों में नहीं है। सबसे पहले अअसम अल-कूफ़ी ने इस वाक़िए को बयान किया है, मगर उसने साफ़ लिखा है कि इमाम मुस्लिम के दोनों साहबज़ादे मुहम्मद व इब्राहीम कर्बला में भी थे, लेकिन दूसरे अह्ले बैत के साथ इब्ने ज़ियाद के हाथों गिरफ़्तार हुए।
शहादत की बात सबसे पहले मुल्ला हुसैन काशिफ़ी ने रौज़तुश्शुहदा में नक़्ल की और मैंने भी उसी से नक़्ल करके यह वाक़िआ लिखा है, लेकिन सच्ची बात यह है कि यह निहायत ग़ैर-मुअतबर वाक़िआ है।
कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा है कि इन बच्चों का वजूद ही साबित नहीं है।
कुछ कहते हैं कि यह औलाद हज़रत जाफ़र तय्यार रज़ियल्लाहु अन्हु की थी और कुछ इन्हें हज़रत अब्दुल्लाह बिन जाफ़र की औलाद बताते हैं। कुछ का कहना है कि वाक़िआ-ए कर्बला से पहले इन दोनों के बारे में कोई मालूमात ही साबित नहीं हैं। सिर्फ़ वाक़िआ-ए कर्बला में उनकी शहादत का इशारा मिलता है।
जब इमाम मुस्लिम कर्बला की तरफ़ जाने का इरादा फ़रमाते हैं तो तारीख़ की तमाम मुअतबर किताबों में कहीं यह नहीं मिलता कि आप अपने बच्चों मुहम्मद व इब्राहीम को साथ लेकर गए थे। इसी तरह जब आपने वसीयत फ़रमाई तो वहाँ भी आपके बच्चों का ज़िक्र नहीं है और न ही कर्बला के रास्ते में कहीं उनका उल्लेख मिलता है।
यह बच्चों की शहादत का वाक़िआ महज़ एक अफ़साना है, जिसका इन्कार शिया भी नहीं कर सके।
एक शिया मोअर्रिख़ ने सालों तक वाक़िआ-ए कर्बला पर तहक़ीक़ करके मुजाहिद-ए आज़म नामी किताब लिखी। उसका पहला हिस्सा मुझे हासिल हुआ, दूसरा हिस्सा बहुत कोशिश के बावजूद न मिल सका। पहले हिस्से में वह लिखता है:
"इस शहादत के वाक़िए की बहस दूसरे हिस्से में तफ़्सील से की जाएगी, लेकिन इस मौक़े पर इतना जान लेना काफ़ी है कि यह वाक़िआ क़दीम व मुस्तनद किताबों में बिल्कुल नहीं है। इस वाक़िए को सबसे पहले साहिबे रौज़तुश्शुहदा ने नक़्ल किया है, लेकिन किसी किताब की सनद नक़्ल नहीं की। रौज़तुश्शुहदा कोई मुस्तनद किताब नहीं है। इसमें ज़ईफ़ और बे-अस्ल रिवायतें बहुतायत से भरी हुई हैं। बाद के मुसन्निफ़ीन ने जो यह वाक़िआ लिखा है, वह सिर्फ़ मुल्ला काशिफ़ी की किताब से नक़्ल किया है और उन्हीं की पैरवी की है। सिलसिला-ए रिवायत के एतबार से भी इसकी तस्दीक़ मुश्तबह और मशकूक है। न इसकी कोई सनद है, न यह तारीख़ की किसी मुअतबर किताब के मुताबिक़ है और न उसूल-ए रिवायत इसके हक़ में हैं। लिहाज़ा इसे ग़लत और मौज़ू (गढ़ा हुआ) कहने के सिवा कोई चारा नहीं।"
(मुजाहिद-ए आज़म, हिस्सा अव्वल, पृ. 197)
वाक़िआ-ए कर्बला में बहुत से ऐसे वाक़िआत बिला-तहक़ीक़ सिर्फ़ एतमाद पर लिख दिए गए, जिनमें मनगढ़ंत रिवायतें भी शामिल हो गईं।
इसकी एक मिसाल यह है कि जब इमामे अहले सुन्नत से एक साइल ने सवाल किया कि हज़रत मुस्लिम के साहबज़ादे कूफ़ा में शहीद हुए या नहीं, जबकि तारीख़-ए तबरी में है कि कूफ़ा में साहबज़ादे मौजूद ही न थे?
तो इसके जवाब में इमामे अहले सुन्नत फ़रमाते हैं:
"यह न तो मुझे इस वक़्त याद है, न तारीख़ देखने की फ़ुर्सत है और न इस सवाल की कोई ज़रूरत है।"
(फ़तावा रज़विया, जि. 24, पृ. 510)
क़ारिईने किराम! साइल के सवाल से मालूम होता है कि उस दौर में भी हज़रत मुस्लिम के बच्चों की शहादत के वाक़िए के बारे में शुब्हा मौजूद था, जिसकी वजह से उसने इमामे अहले सुन्नत से सवाल किया।
जैसा कि हम बयान कर चुके हैं कि इन अकाबिर का मैदान तारीख़ नहीं था, बल्कि उन्हें फ़िक़्ह, उसूल-ए फ़िक़्ह, हदीस, उसूल-ए हदीस, तफ़्सीर और दूसरे उलूम में महारत हासिल थी। लेकिन तारीख़ उनका अस्ल मैदान नहीं था। जैसा कि इमामे अहले सुन्नत के जवाब से भी ज़ाहिर है कि उन्होंने फ़रमाया: "मुझे इस वक़्त इस बारे में कुछ याद नहीं" और साथ ही फ़रमाया: "तारीख़ की किताबें देखने की फ़ुर्सत नहीं।"
चूँकि इमामे अहले सुन्नत के पास सवालों-जवाबों की बहुतायत रहती थी, इसलिए उन्हें तारीख़ी किताबों की तरफ़ रुजू करने की फ़ुर्सत कम मिलती थी। इसके अलावा दूसरे दीनि कामों की मशग़ूलियत भी रहती थी।
क़ारिईने किराम! हमने इस वाक़िए के साथ-साथ दूसरे कई वाक़िआत के भी मनगढ़ंत होने को बयान कर दिया है। लिहाज़ा ऐसी मनगढ़ंत रिवायतों से बचना हम पर ज़रूरी है, जिनकी तहक़ीक़ हमने "वाक़िआत-ए कर्बला की तहक़ीक़ व तर्दीद" में कर दी है।
उसकी PDF इसी नाम से गूगल से भी डाउनलोड की जा सकती है।
ख़ुलासा-ए कलाम:
इमाम मुस्लिम बिन अकील रज़ियल्लाहु अन्हु के साहबज़ादों का वाक़िआ भी उन मनगढ़ंत वाक़िआत में से है, जिन्हें लोगों को रुलाने और दहाड़ें मार-मार कर आँसू बहाने के लिए वाइज़ीन अपने बयानों में, ज़ाकिरीन अपने ख़िताबों में और ग़ैर-मुहतात मुसन्निफ़ अपनी तस्नीफ़ात में बयान करते हैं।
✍️ (कर्बला की तहक़ीक़ व तर्दीद)
मुतर्जिम: दारुल इफ्ता गुलज़ारे तैयबा टीम
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