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اشاعتیں

आशूरा के दिन सुरमा लगाना

आशूरा के दिन सुरमा लगाना (आशूरा के दिन सुरमा लगाने से आँखें नहीं दुखेंगी – रिवायत की तहक़ीक़) आशूरा के दिन के बारे में एक रिवायत बयान की जाती है कि जो व्यक्ति आशूरा के दिन सुरमा लगाएगा उसकी आँखें नहीं दुखेंगी। इस रिवायत को इमाम सुयूती, इमाम बैहक़ी और दैलमी ने हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से नक़्ल किया है। कुछ मुहद्दिसीन के नज़दीक यह रिवायत ज़ईफ़ है, लेकिन इमाम इब्ने जौज़ी ने इसे मौज़ू (गढ़ी हुई) क़रार दिया है। इस रिवायत को अल्लामा अजलूनी ने अपनी किताब कश्फ़ुल ख़फ़ा में ज़िक्र किया है और उनके नज़दीक भी यह रिवायत मौज़ू है। इमाम सख़ावी ने अपनी किताब मक़ासिदुल हसना में भी इसे मौज़ू कहा है। इमाम हाकिम इस रिवायत के बारे में फ़रमाते हैं: "والاکتحال یوم عاشوراء لم یرد عن النبی صلی اللہ علیہ وسلم فیہ اثر وھو بدعۃ ابتدعھا قتلۃ الحسین" अर्थात: आशूरा के दिन सुरमा लगाने के बारे में नबी करीम ﷺ से कोई रिवायत साबित नहीं है, बल्कि यह एक बिदअत है जिसे हज़रत इमाम हुसैन के क़ातिलों ने ईजाद किया। (अल-मक़ासिदुल हसना, हदीस नं. 1085) यानी इमाम-ए-आली मक़ाम के क़ातिलों ने इमाम हुसैन रज़ियल्ल...

खैमा एहले बैत में पानी

ख़ैमा-ए-अहले बैत में पानी मौजूद था ख़ैमा-ए-अहले बैत में पानी मौजूद होने के रावी हज़रत ज़ैनुल आबिदीन हैं हज़रत ज़ैनुल आबिदीन रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं: जिस रात की सुबह मेरे वालिद माजिद शहीद हुए, मैं उसकी शाम को बैठा हुआ था। मेरे वालिद और उनके साथी जब ख़ैमे में चले जाते तो मेरी फूफी हज़रत ज़ैनब मेरी तीमारदारी करतीं। मेरे वालिद ने कुछ अशआर पढ़े और इन अशआर को तीन बार दोहराया। मैंने उन्हें याद कर लिया और अपने वालिद का मक़सद समझ गया था। फिर आँसुओं ने मेरा गला घोंट दिया और मैं समझ गया कि कोई बड़ी मुसीबत नाज़िल होने वाली है। मेरी फूफी परेशानी की हालत में खड़ी हो गईं और उनके चेहरे पर ग़म के आसार थे। इमाम-ए-आली मक़ाम से कहने लगीं: काश! ये लोग आपसे क़िताल न करते, आपको शहीद न करते। यह कहकर बेहोश होकर गिर पड़ीं। तब इमाम-ए-आली मक़ाम रज़ियल्लाहु अन्हु ने उनके चेहरे पर पानी डाला और फ़रमाया: “मेरी बहन! सब्र करो, अल्लाह की रहमत बहुत वसीअ है। अहले ज़मीन सब मर जाएँगे, हर चीज़ फ़ना हो जाएगी, सिर्फ़ अल्लाह अज़्ज़ व जल्ल की पाक ज़ात बाक़ी रहेगी।” तारीख़-ए-तबरी , जिल्द 5, सफ़्हा 420 पर इसकी सनद इस प...

हूसैनी ब्राम्हण का किस्सा

(क्या कर्बला में हुसैनी ब्राह्मण थे?) जहाँ वाक़ियात-ए-कर्बला में बहुत से मनगढ़ंत और झूठे किस्से मशहूर कर दिए गए हैं, उन्हीं में से एक किस्सा यह भी है कि कर्बला में यज़ीदी फ़ौज से लड़ने के लिए कुछ "हुसैनी ब्राह्मण" भी गए थे। यह वाक़िआ कुछ इस तरह बयान किया जाता है: एक दत्त हुसैनी ब्राह्मण, राहब दत्त नाम का व्यक्ति, अपने सात बेटों को कर्बला में क़ुर्बान कर देता है और हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत के बाद मुख़्तार सक़फ़ी के साथ मिलकर यज़ीदियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिस्सा लेता है। कहा जाता है कि राहब सिंह दत्त हिंदुस्तान के उत्तरी इलाक़े (पंजाब-हरियाणा) के जाट ब्राह्मण थे और अरब में व्यापार की ग़रज़ से रहते थे। इन जाट ब्राह्मणों को "मोहीयाल" कहा जाता था। ये लोग पढ़े-लिखे होते थे और राजाओं के सलाहकार या राजगुरु के रूप में सेवाएँ देते थे। दावा किया जाता है कि राहब दत्त की कोई औलाद नहीं थी। एक दिन वह हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की ख़िदमत में हाज़िर हुए और औलाद के लिए दुआ की दरख़्वास्त की। इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने फ़रमाया कि उनकी तक़दीर में औलाद नह...

आशुरा के दिन नमाज़ मोजु रिवायत

🌹 आशूरा के दिन नमाज़ 🌹 दारुल इफ्ता गुलज़ारे तैयबा – 02/06/2026 (आशूरा की कुछ खास नमाज़ें जो मौज़ू (गढ़ी हुई) रिवायतों से साबित बताई जाती हैं) शैख अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाहि अलैह ने अपनी किताब "मा साबित मिनस्सुन्नह" में लिखा है: आशूरा के दिन के बारे में कुछ रिवायतों में यह बयान किया गया है कि यही वह दिन है जब दुनिया पैदा की गई, पहली बारिश हुई, और जिसने इस दिन रोज़ा रखा उसने मानो पूरी उम्र रोज़े रखे। इसी तरह यह भी कहा गया कि जिसने आशूरा की रात इबादत में गुज़ारी, उसे सातों आसमान वालों की इबादत के बराबर सवाब मिलेगा। इसी प्रकार एक रिवायत में चार रकअत नमाज़ का ज़िक्र है कि हर रकअत में सूरह फ़ातिहा के बाद पचास बार "कुल हुवल्लाहु अहद" पढ़ी जाए तो पिछले और अगले पचास साल के गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे। कुछ रिवायतों में यह भी है कि जिसने एक घूंट पानी पिलाया, वह ऐसा है मानो उसने कभी गुनाह न किया हो؛ जिसने अहले बैत के किसी गरीब को खाना खिलाया वह पुल सिरात से बिजली की तरह गुज़रेगा؛ जिसने सदक़ा किया उसने कभी किसी साइल को खाली नहीं लौटाया؛ और जिसने आशूरा के दिन ...

جھوٹی روایات بیان کرنا ؟

السلام علیکم حضرت صاحب آج کل کجھ لوگ بولتے ہیں اللہ فرماتا ہے حالانکہ اللہ نے نہیں فرمایا ہوتا- اور اسی طرح حدیث و بزرگوں کے اقوال کو ان کی طرف منسوب کرنا کیسا؟ جبکہ حدیث و بزرگوں نے نہیں فرمایا ہوتا، ایسے لوگوں کے بارے میں کیا حکم ہے؟ لوگوں کا بنا ثبوت و تحقیق کے پھیلانا کیسا اور  اسی طرح سے بعض حضرت تقریر کرنے والے حدیث کو ہو-بہ-ہو (same to same) بیان نہں کرتے اور اپنی طرف سے ملاکر پیش کر دیتے ہیں، جبکہ کتابوں میں، الفاظ الگ ہوتے ہیں، اس بارے میں کیا حکم ہوگا؟ ابراھیم خان، راجستھان۔ الجواب وباللہ توفیق صورت مسئولہ میں وعلیکم السلام ورحمۃ اللہ وبرکاتہ اللہ تعالیٰ، رسولِ اکرم ﷺ، صحابۂ کرام، اولیائے عظام اور اکابر علماء کی طرف کوئی بات منسوب کرنا بہت بڑی ذمہ داری ہے۔ اگر کوئی شخص بغیر تحقیق اور ثبوت کے یہ کہے کہ "اللہ تعالیٰ فرماتا ہے" یا "حضور ﷺ نے فرمایا" یا "فلاں بزرگ نے فرمایا"، حالانکہ حقیقت میں ایسا نہ ہو، تو یہ سخت گناہ اور ناجائز عمل ہے۔ قرآنِ کریم میں اللہ تعالیٰ ارشاد فرماتا ہے: "وَلَا تَقْفُ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ" "اور اس بات...

محرم الحرام میں باجا بجانے

الجواب وباللہ توفیق  محرم الحرام حرمت و عظمت والا مہینہ ہے۔ اس مہینے میں گناہوں سے بچنے، سنتوں پر عمل کرنے اور شہدائے کربلا خصوصاً سیدنا امام حسین رضی اللہ تعالیٰ عنہ کی صحیح تعلیمات کو عام کرنے کا حکم ہے، نہ کہ ناجائز رسموں، باجوں اور گمراہ فرقوں کے مذہبی شعائر کی اشاعت کا۔ اولاً: DJ اور باجوں کا حکم اللہ تعالیٰ ارشاد فرماتا ہے: وَمِنَ النَّاسِ مَنْ يَّشْتَرِيْ لَهْوَ الْحَدِيْثِ لِيُضِلَّ عَنْ سَبِيْلِ اللّٰهِ "اور بعض لوگ لہو کی باتیں خریدتے ہیں تاکہ اللہ کے راستے سے گمراہ کریں۔" (سورۂ لقمان، آیت: 6) حضرت عبداللہ بن مسعود رضی اللہ عنہ اس آیت کی تفسیر میں فرماتے ہیں: "والله الذي لا إله غيره هو الغناء" "اس ذات کی قسم جس کے سوا کوئی معبود نہیں، اس سے مراد گانا بجانا ہے۔" (تفسیر طبری، تفسیر ابن ابی حاتم) اور رسول اللہ ﷺ نے فرمایا: "ليكونن من أمتي أقوام يستحلون الحر والحرير والخمر والمعازف" "میری امت میں ایسے لوگ ضرور ہوں گے جو زنا، ریشم، شراب اور باجوں کو حلال ٹھہرائیں گے۔" (صحیح بخاری، کتاب الاشربۃ) لہٰذا DJ، باجے اور موسیقی کا استعمال ...

محرم الحرام میں مکان کا افتتاح

🌹 بسم اللہ الرحمٰن الرحیم 🌹 دارالافتاء گلزارِ طیبہ، گجرات محرم الحرام میں شادی، مکان کا افتتاح اور دیگر جائز کاموں کا شرعی حکم السؤال: بعض لوگ کہتے ہیں کہ محرم الحرام میں شادی کرنا، نکاح پڑھانا، نئے مکان کا افتتاح کرنا، گھر میں داخل ہونا، کاروبار شروع کرنا یا دیگر خوشی کے کام انجام دینا جائز نہیں۔ بعض لوگ اس مہینے کو نحوست والا مہینہ سمجھتے ہیں۔ شرعاً اس کا کیا حکم ہے؟ الجواب وباللہ توفیق صورت مسئولہ میں  محرم الحرام اسلامی سال کا پہلا مہینہ اور اشہرِ حرم میں سے ایک عظیم اور بابرکت مہینہ ہے۔ قرآن و حدیث میں کہیں بھی یہ حکم موجود نہیں کہ اس مہینے میں نکاح، شادی، مکان کا افتتاح، نئے گھر میں منتقل ہونا یا دیگر جائز کام کرنا ممنوع ہو۔ بلکہ شریعتِ مطہرہ ہر وقت نیکی اور جائز کاموں کی ترغیب دیتی ہے۔ اللہ تعالیٰ ارشاد فرماتا ہے: ﴿فَاسْتَبِقُوا الْخَيْرَاتِ﴾ ترجمہ: "نیکیوں میں ایک دوسرے سے آگے بڑھو۔" (سورۃ البقرۃ، آیت: 148) نیز ارشاد فرمایا: ﴿وَافْعَلُوا الْخَيْرَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ﴾ ترجمہ: "اور نیکی کے کام کرتے رہو تاکہ تم فلاح پاؤ۔" (سورۃ الحج، آیت: 77) نبی کریم ﷺ ن...