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मोहर्रम में निकाह

अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू

सवाल :
आजकल सोशल मीडिया पर बहुत से लोग सना-ख़्वाँ हज़रत ओवैस रज़ा क़ादरी साहब पर मुहर्रमुल हराम में अपने बच्चों की शादी करने की वजह से एतराज़ कर रहे हैं और कुछ लोग उन्हें नासिबी, यज़ीदी और ख़ारिजी तक कह रहे हैं। जबकि कुछ उलेमा ने मुहर्रम में निकाह को जायज़ बताया है। इस बारे में शरीअत का क्या हुक्म है?

अल-जवाब बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

मुहर्रमुल हराम में निकाह और शादी करना शरीअतन जायज़ है। क़ुरआन, हदीस और फ़ुक़हा-ए-किराम की किसी भी मुस्तनद किताब में मुहर्रम के महीने में निकाह को हराम, नाजायज़ या ममनूअ नहीं बताया गया है।

सबसे पहले यह बात याद रखनी चाहिए कि दीन में हलाल और हराम का फैसला अल्लाह तआला और उसके रसूल ﷺ के हुक्म से होता है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:

"और किसी मुसलमान मर्द और मुसलमान औरत के लिए यह जायज़ नहीं कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी बात का फैसला फ़रमा दें तो फिर उन्हें अपने मामले में कोई इख़्तियार बाकी रहे। और जो अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी करे, वह खुली गुमराही में पड़ गया।"

(सूरह अल-अहज़ाब, आयत 36)

एक दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया:

"और रसूल तुम्हें जो कुछ दें उसे ले लो और जिस चीज़ से मना करें उससे रुक जाओ।"

(सूरह अल-हश्र, आयत 7)

जब अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने मुहर्रम में निकाह से मना नहीं फ़रमाया, तो किसी व्यक्ति को यह हक़ नहीं कि वह अपनी तरफ़ से उसे हराम या नाजायज़ ठहरा दे।

अगर कोई यह दावा करता है कि मुहर्रम में शादी करना मना है, तो उस पर ज़िम्मेदारी है कि वह क़ुरआन, हदीस या फ़ुक़हा की किसी स्पष्ट इबारत से अपनी बात साबित करे। केवल भावनाओं या सुनी-सुनाई बातों की बुनियाद पर किसी मुसलमान को नासिबी, यज़ीदी या ख़ारिजी कहना बहुत गंभीर बात है।

रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

"आदमी के झूठा होने के लिए इतना ही काफ़ी है कि वह हर सुनी-सुनाई बात बयान कर दे।"

(सहीह मुस्लिम, हदीस 7, 9)

इसी तरह अल्लाह तआला फ़रमाता है:

"ऐ ईमान वालो! अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई खबर लाए तो उसकी तहक़ीक़ कर लिया करो, कहीं ऐसा न हो कि तुम किसी क़ौम को नादानी में तकलीफ़ पहुँचा बैठो, फिर अपने किए पर पछताना पड़े।"

(सूरह अल-हुजुरात, आयत 6)

लिहाज़ा मुहर्रम में निकाह करना शरीअतन जायज़ है। इस वजह से किसी मुसलमान को नासिबी, यज़ीदी या ख़ारिजी कहना सख़्त नाजायज़, गुनाह और फ़ितना फैलाने का सबब है। मुसलमानों को चाहिए कि बिना तहक़ीक़ किसी पर इल्ज़ाम लगाने से बचें और शरीअत के अहकाम को क़ुरआन व सुन्नत की रोशनी में समझें।

अब इन लोगों के कज़्ज़ाब (झूठे) और फ़ासिक़ होने में क्या कमी रह गई?

कज़्ज़ाब इसलिए कि इन्होंने हज़रत ओवैस रज़ा क़ादरी साहब पर इल्ज़ाम लगाया, लेकिन अपने दावे पर कोई शरई या ठोस सबूत पेश नहीं कर सके।

और फ़ासिक़ इसलिए कि इन्होंने एक मुसलमान की दिल-आज़ारी की, जबकि मुसलमान को गाली देना और उसकी तौहीन करना फ़िस्क़ है।

जैसा कि फ़तावा जावीदिया, जिल्द 1, सफ़्हा 8 में हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

"मुसलमान को गाली देना फ़िस्क़ है।"

इसी तरह मुसलमान की हुरमत काबा शरीफ़ से भी बढ़कर है। हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अन्हुमा फ़रमाते हैं कि मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को काबा शरीफ़ का तवाफ़ करते हुए देखा। आप ﷺ फ़रमा रहे थे:

"तू कितना पाकीज़ा है, तेरी खुशबू कितनी अच्छी है, तेरा रुतबा कितना बुलंद है और तेरी हुरमत कितनी अज़ीम है। लेकिन उस ज़ात की क़सम जिसके क़ब्ज़े में मुहम्मद (ﷺ) की जान है, अल्लाह तआला के नज़दीक एक मोमिन की हुरमत तुझसे भी ज़्यादा है।"

(फ़तावा जावीदिया, जिल्द 1, सफ़्हा 196)

अब उन ख़तीबों और तक़रीर करने वालों को ग़ौर करना चाहिए कि अगर कोई मुसलमान कोई जायज़ काम कर रहा हो, लेकिन वह तुम्हारी राय के मुताबिक़ न हो, तो क्या उसे ख़ारिजी, नासिबी और यज़ीदी कहना जायज़ हो जाएगा?

अब इनके इस दावे का भी जायज़ा लेते हैं कि "मुहर्रमुल हराम ग़म का महीना है, इसलिए उसमें शादी नहीं करनी चाहिए।"

बेशक हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत पूरी उम्मत के लिए दुखद घटना है और हर मुसलमान के दिल में उनका ग़म और मोहब्बत होनी चाहिए, लेकिन शरीअत ने ग़म मनाने की भी हदें मुक़र्रर की हैं।

इमाम मुस्लिम रहमतुल्लाहि अलैह ने तीन दिन से ज़्यादा सोग की ममनूइयत पर बाक़ायदा बाब क़ायम किया है।

हज़रत नाफ़े रहमतुल्लाहि अलैह बयान करते हैं कि हज़रत ज़ैनब बिन्ते अबी सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा ने उनसे तीन हदीसें बयान कीं। उनमें से एक यह है कि जब उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे हबीबा रज़ियल्लाहु अन्हा के वालिद हज़रत अबू सुफ़यान रज़ियल्लाहु अन्हु का इंतिक़ाल हुआ, तो तीन दिन बाद उन्होंने ज़र्द रंग की खुशबू मंगवाई और अपने गालों पर लगाई। फिर फ़रमाया:

"अल्लाह की क़सम! मुझे इस खुशबू की कोई ज़रूरत नहीं थी, लेकिन मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को यह फ़रमाते हुए सुना है कि जो औरत अल्लाह और यौमे आख़िरत पर ईमान रखती हो, उसके लिए किसी मय्यत पर तीन दिन से ज़्यादा सोग करना जायज़ नहीं, अलबत्ता अपने शौहर की वफ़ात पर चार महीने दस दिन सोग करेगी।"

(सहीह मुस्लिम, हदीस नं. 2619)

जब शरीअत ने किसी भी मय्यत पर तीन दिन से ज़्यादा सोग करने की इजाज़त नहीं दी, तो हर साल मुहर्रम के महीने को स्थायी तौर पर सोग और मातम का महीना बना लेना और उसकी वजह से जायज़ कामों को नाजायज़ ठहराना शरई दलील का मुहताज है।
हज़रत आयशा सिद्दीका रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:

"जो औरत अल्लाह तआला और क़ियामत के दिन पर ईमान रखती हो, उसके लिए जायज़ नहीं कि वह अपने शौहर के अलावा किसी और मय्यत पर तीन दिन से ज़्यादा सोग करे।"

(सहीह मुस्लिम, हदीस नं. 3629)

इस हदीस से मालूम हुआ कि इंसान के दिल में ग़म और दुख का एहसास होना चाहिए, लेकिन शरीअत ने ग़म के इज़हार की एक हद मुक़र्रर फ़रमा दी है। किसी मय्यत पर तीन दिन से ज़्यादा सोग करना जायज़ नहीं, सिवाय शौहर के इंतिक़ाल के, जिसकी इद्दत चार महीने दस दिन है।

अब फैसला इंसाफ़-पसंद क़ारईन के हाथ में है कि शरीअत का हुक्म तो यह है कि तीन दिन से ज़्यादा सोग करना जायज़ नहीं, जबकि कुछ नादान ख़तीब और तक़रीर करने वाले सदियाँ गुज़र जाने के बाद भी हर साल सोग और मातम को ज़रूरी ठहराने की कोशिश करते हैं।

याद रखिए! हमें अल्लाह तआला और उसके रसूल ﷺ की इताअत का हुक्म दिया गया है, किसी ऐसे पीर, ख़तीब या वक्ता की इताअत का नहीं जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के हुक्म के ख़िलाफ़ बात करे।

अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है:

"बेशक जो लोग अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालफ़त करते हैं, वही सबसे ज़्यादा ज़लील लोगों में से हैं।"

(सूरह अल-मुजादिला, आयत 20)

इंसाफ़ से सोचिए! जिस काम से अल्लाह और उसके रसूल ﷺ ने मना नहीं फ़रमाया, उसे हराम या नाजायज़ ठहराने वाले लोग कौन हैं? शरीअत में अपनी तरफ़ से पाबंदियाँ लगाना और जायज़ चीज़ों को नाजायज़ बताना बहुत ख़तरनाक रवैया है।

ऐसे गुमराह करने वाले लोगों के बारे में हज़रत सऊबान रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:

"मुझे अपनी उम्मत के बारे में सबसे ज़्यादा ख़ौफ़ गुमराह करने वाले पेशवाओं से है।"

(सुनन दारिमी, हदीस 211)

इसी तरह बुज़ुर्गों ने फ़ासिक़ आलिम से बचने की भी ताकीद फ़रमाई है। हज़रत हरम बिन हय्यान रहमतुल्लाहि अलैह ने फ़रमाया:

"फ़ासिक़ आलिम से बचो।"

जब यह बात हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु तक पहुँची तो आपने पूछा कि फ़ासिक़ आलिम से क्या मुराद है?

उन्होंने जवाब दिया:

"ऐ अमीरुल मोमिनीन! कभी ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति इल्म की बातें तो करता है, लेकिन उसका अमल गुनाहों पर होता है। ऐसे व्यक्ति की वजह से लोग ग़लतफ़हमी में पड़ जाते हैं और गुमराही का शिकार हो जाते हैं।"

लिहाज़ा मुसलमानों को चाहिए कि हर बात को क़ुरआन व सुन्नत और अकाबिर-ए-अहले सुन्नत की तालीमात की रोशनी में परखें, न कि जोश, जज़्बात और बेबुनियाद इल्ज़ामों की बुनियाद पर फ़ैसले करें।

मुहर्रम में शादी से मना करना शरई तौर पर सही नहीं

जैसा कि हनीफ़ कुरैशी और उनके जैसे कुछ ख़तीब एक ग़लतफ़हमी में मुब्तला होकर लोगों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि मुहर्रमुल हराम में शादी करने से शरीअत ने कहीं भी मना नहीं किया है। मुसलमान को चाहिए कि वह सिर्फ़ क़ुरआन व सुन्नत का दामन मज़बूती से थामे रखे।

रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फ़रमाया:

"खुशख़बरी सुनो! क्या तुम गवाही नहीं देते कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मैं अल्लाह का रसूल हूँ, और यह अल्लाह का क़ुरआन है, इसका एक सिरा अल्लाह के दस्ते-क़ुदरत में है और दूसरा सिरा तुम्हारे हाथ में है, पस इसे मज़बूती से थाम लो, फिर तुम हरगिज़ गुमराह न होगे और न हलाक होगे।"
(कंजुल उम्माल, जिल्द 1, हदीस 937)

इस हदीस पाक से मालूम हुआ कि किसी ख़तीब, पीर या मौलवी की वही बात क़ाबिले-क़बूल होगी जो क़ुरआन व सुन्नत के मुताबिक़ हो, वरना उसकी बात की कोई हैसियत नहीं। यही हाल उन लोगों की बात का है जो कहते हैं कि मुहर्रमुल हराम में शादी नहीं करनी चाहिए, जबकि उनके पास इस ममानअत की कोई शरई दलील मौजूद नहीं है।

इसके बरअक्स हम क़ुरआन व सुन्नत की रौशनी में यह साबित कर चुके हैं कि मुहर्रमुल हराम में निकाह करना जायज़ है, जैसे पहले निकाह करना सुन्नत था वैसे ही आज भी सुन्नत है।

अब हम अहले सुन्नत के उन अकाबिर मुफ़्तियाने किराम के फ़तावे पेश करते हैं जिनके इल्म पर अहले सुन्नत को फ़ख्र है।

हज़रत मुफ़्ती तहीर अहमद रज़वी फ़रमाते हैं:

"माहे मुहर्रमुल हराम में कितनी रसूम, बिदअतें और ख़ुराफ़ात आजकल मुसलमानों में राइज हो गई हैं कि उनका शुमार मुश्किल है। उन्हीं में से एक यह भी है कि यह महीना सोग और ग़मी का है, इसलिए इसमें शादी-ब्याह न किया जाए। हालाँकि इस्लाम में किसी भी मय्यत का तीन दिन से ज़्यादा ग़म मनाना नाजायज़ है, और इन दिनों में शादी-ब्याह को बुरा समझना गुनाह है। निकाह साल के किसी भी दिन मना नहीं, चाहे मुहर्रमुल हराम हो, सफ़र हो या कोई और महीना।"
(ग़लत फ़हमियाँ, पृष्ठ 133)

इस फ़तवे पर ग़ौर कीजिए। हज़रत फ़रमा रहे हैं कि इस महीने में शादी को बुरा समझना गुनाह है। अब इंसाफ़ से बताइए कि जो लोग मुहर्रम में शादी से मना करते हैं, क्या वे मुसलमानों को गुनाह की दावत नहीं दे रहे?

मुफ़्ती-ए-आज़म पाकिस्तान प्रोफ़ेसर मुहम्मद मुनीबुर्रहमान साहब से भी ऐसा ही सवाल किया गया तो आपने फ़रमाया:

"मुहर्रम, सफ़र या साल के किसी भी महीने में निकाह करना मना नहीं है।"
(तफ़हीमुल मसाइल, जिल्द 1, पृष्ठ 243)

इसी तरह इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी रहमतुल्लाहि अलैह फ़रमाते हैं:

"माहे मुहर्रमुल हराम और सफ़र में निकाह करना मना नहीं, बल्कि किसी भी महीने में निकाह करना जायज़ है।"
(फ़तावा रज़विया, जिल्द 11, पृष्ठ 265)
(अहकामे शरीअत, पृष्ठ 127)

नाज़िरीने किराम! हमने मुकम्मल तहक़ीक़ के साथ वाज़ेह कर दिया कि मुहर्रमुल हराम हो या कोई और महीना, किसी भी महीने में शादी करना मना नहीं है। तहरीर के तवील हो जाने के ख़ौफ़ से हमने मुख़्तसर जवाब लिखा है, वरना अल्लाह के फ़ज़्ल से जवाद (जायज़ होने) पर इतने हवाले पेश किए जा सकते हैं कि मुख़ालिफ़ीन उन्हें गिनते-गिनते थक जाएँ।

अल्लाह तआला मुसलमानों की हिफ़ाज़त फ़रमाए, उन्हें सिराते मुस्तक़ीम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।

वल्लाहु आ'लमु व रसूलुहू आ'लम ﷺ

दारुल इफ्ता गुलजार ए तैयबा 
फ़क़ीर अबू अहमद एम. जे. अकबरी

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