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ڈھول بجانے کا حکم عالمگیری سے

क्या "अली के दर का कुत्ता" कह देने से कोई हज़रत अली वाला बन जाता है?

आजकल कुछ ख़तीब और तक़रीर करने वाले बड़े जोश के साथ कहते हैं:

"मैं अली के दर का कुत्ता हूँ।"
"मैं अली का ग़ुलाम हूँ।"
"मैं अहले बैत का सच्चा चाहने वाला हूँ।"

लेकिन जब मुहर्रम आता है तो यही लोग ढोल-ताशों, बाजों और तरह-तरह की रस्मों की हिमायत करने लगते हैं, जिनका न क़ुरआन में कोई सबूत मिलता है, न हदीस में और न ही हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की तालीमात में।

जब उनसे दलील माँगी जाती है तो कुछ लोग फ़तावा आलमगीरी का ग़लत हवाला देकर अवाम को गुमराह करने की कोशिश करते हैं।

फ़तावा आलमगीरी का असली मसला

फ़तावा आलमगीरी में यह इबारत मौजूद है:

"وسئل أبو يوسف رحمه الله عن الدف في غير النكاح إذا ضربته المرأة للصبي، فقال: لا أرى به بأساً، وإنما أكره ما كان من اللهو الفاحش الذي يهيج الناس على الفساد."

इसका मतलब यह है:

"इमाम अबू यूसुफ रहमतुल्लाहि अलैह से निकाह के अलावा उस दफ़ के बारे में पूछा गया जिसे कोई औरत बच्चे के लिए बजाए, तो आपने फ़रमाया कि मैं इसमें कोई हरज नहीं समझता। हाँ, उस खेल-तमाशे और लह्व-ओ-लअब को नापसंद जानता हूँ जो लोगों को फ़साद और बुराई की तरफ़ उकसाए।"

📚 फ़तावा आलमगीरी, जिल्द 9, सफ़्हा 79

अब ज़रा इंसाफ़ से बताइए:

क्या इस इबारत में ढोल का ज़िक्र है? नहीं।

क्या इसमें मर्दों के लिए बाजा बजाने की इजाज़त है? नहीं।

क्या इसमें मुहर्रम के जुलूसों का ज़िक्र है? नहीं।

क्या इसमें ताज़ियादारी के ढोल-ताशों का ज़िक्र है? नहीं।

क्या इसमें आम गाने-बाजे को जायज़ कहा गया है? नहीं।

पूरी इबारत सिर्फ़ एक औरत द्वारा बच्चे को बहलाने के लिए दफ़ बजाने के बारे में है।

फिर जो लोग इस इबारत से ढोल, ताशा, बैंड-बाजा और जुलूसों के शोर-शराबे को जायज़ साबित करते हैं, वे फ़तावा आलमगीरी का सही मतलब नहीं बता रहे बल्कि अपनी मनमानी व्याख्या करके लोगों को धोखा दे रहे हैं।

हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की तालीम क्या थी?

हम उन लोगों से पूछते हैं जो हर वक़्त "या अली" के नारे लगाते हैं:

क्या हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने मुहर्रम में ढोल बजाने की तालीम दी थी?

क्या आपने बाजे बजाने, शोर मचाने और नई रस्में शुरू करने का हुक्म दिया था?

क्या आपने दीन को रस्मों और तमाशों में बदलने की शिक्षा दी थी?

अगर नहीं, तो फिर आपके नाम पर यह सब क्यों किया जा रहा है?

सिर्फ़ मोहब्बत का दावा काफ़ी नहीं

हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु سے منقول है:

"अनक़रीब यह उम्मत तिहत्तर (73) फ़िर्क़ों में बँट जाएगी। उनमें सबसे बुरा फ़िर्क़ा वह होगा जो मुझसे मोहब्बत का दावा करेगा मगर मेरे जैसे आमाल इख़्तियार नहीं करेगा।"

📚 तारीख़ इब्ने कसीर, जिल्द 4, सफ़्हा 235

इस कथन का संदेश बिल्कुल साफ़ है कि केवल मोहब्बत का दावा करना काफ़ी नहीं, बल्कि हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की तालीमात और उनके रास्ते पर चलना भी ज़रूरी है।

आज कुछ लोग हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु का नाम तो बहुत लेते हैं, लेकिन उनके आमाल, उनके तक़वा, उनकी इबादत, उनकी सुन्नत की पैरवी और उनके इल्म को अपनाने के बजाय नई-नई रस्मों को दीन बना लेते हैं।

असली अली वाला कौन?

असली अली वाला वह नहीं जो सबसे ऊँची आवाज़ में नारे लगाए।

असली अली वाला वह नहीं जो ढोल-ताशों के बीच अपने आपको अहले बैत का आशिक़ बताए।

असली अली वाला वह है जो क़ुरआन पर चले।

असली अली वाला वह है जो सुन्नत पर अमल करे।

असली अली वाला वह है जो दीन में नई रस्में पैदा करने से बचे।

असली अली वाला वह है जो हर बात में दलील को माने।

झूठी दलीलों से बचो

अल्लाह तआला फ़रमाता है:

"फिर हम झूठों पर अल्लाह की लानत ठहराएँ।"

📖 सूरह आले इमरान, आयत 61

इसलिए अकाबिर फ़ुक़हा की इबारतों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना, उनका ग़लत अर्थ निकालना और अवाम को गुमराह करना बहुत बड़ा गुनाह है।

याद रखिए!

मोहब्बत का दावा ज़ुबान से होता है, लेकिन मोहब्बत का सबूत अमल से दिया जाता है।

अगर कोई सचमुच हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से मोहब्बत करता है तो उसे उनके बताए हुए रास्ते पर चलना होगा, न कि ऐसे काम करने होंगे जिनका सबूत न क़ुरआन में हो, न हदीस में और न ही अहले बैत की तालीमात में।

मुफ्ती अबू अहमद एम. जे. अकबरी 
दारुल इफ़्ता गुलज़ार तैयबा
बफ़ैज़े रूहानी अल्लामा ग़ुलाम रसूल सईदी रहमतुल्लाहि अलैह

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