जब कर्बला में पानी था तो उलेमा ने क्यों लिखा कि तीन दिन पानी बंद रहा?
(जब मैदान-ए कर्बला में पानी मौजूद था तो आला हज़रत रहमतुल्लाहि अलैह, हज़रत अल्लामा जलालुद्दीन, अल्लामा हसन रज़ा और अल्लामा नईमुद्दीन मुरादाबादी रहिमहुमुल्लाह ने क्यों लिखा कि तीन दिन पानी बंद रहा?)
क़ारिईने किराम!
हमने कर्बला में पानी मौजूद होने के बारे में अपनी किताब "वाक़िआत-ए कर्बला की तहक़ीक़ व तर्दीद" में तफ़्सीली कलाम किया है और कुतुब-ए-मुअतबरा से दलीलें पेश की हैं। वह तहरीर व्हाट्सऐप के ज़रिये आप तक भी पहुँची। बहुत से उलेमा-ए किराम ने उसे पसंद फ़रमाया, हमारी हौसला-अफ़ज़ाई की और दुआओं से नवाज़ा।
लेकिन इस तफ़्सीली बहस के बाद भी कुछ लोगों के ज़ेहन में एक सवाल पैदा हुआ कि जब पानी मौजूद था तो हमारे अकाबिर ने तीन दिन पानी बंद रहने की रिवायत क्यों बयान की?
इसी सवाल का जवाब पेश है।
فنقول وبالله التوفيق
इमामे अहले सुन्नत इमाम अहमद रज़ा ख़ाँ बरेलवी रहमतुल्लाहि अलैह, अल्लामा हसन रज़ा ख़ाँ रहमतुल्लाहि अलैह, मुफ़्ती नईमुद्दीन मुरादाबादी रहमतुल्लाहि अलैह और अल्लामा मुफ़्ती जलालुद्दीन अमजदी रहमतुल्लाहि अलैह ने अपनी किताबों में लिखा है कि कर्बला में तीन दिन पानी बंद रहा।
आला हज़रत फ़तावा रज़विया में लिखते हैं:
"रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जिगर के टुकड़े को तीन दिन बे-आब व दाना रखकर, उनके साथियों समेत, ज़ुल्म की तलवार से प्यासा ज़बह किया गया।"
(फ़तावा रज़विया, जिल्द 14, सफ़्हा 593)
यहाँ इमामे अहले सुन्नत ने तीन दिन बे-आब रहने का ज़िक्र किया है। ज़ाहिर है कि यह बात उन्होंने अपनी तरफ़ से नहीं कही होगी, बल्कि किसी किताब की इबारत को बुनियाद बनाया होगा। हालांकि उन्होंने उस किताब का नाम नहीं बताया।
इसी तरह अल्लामा मुफ़्ती नईमुद्दीन मुरादाबादी रहमतुल्लाहि अलैह लिखते हैं:
"आले रसूल को लब-ए-आब पानी मयस्सर न आता था। सरचश्मा-ए-तयम्मुम से नमाज़ें पढ़नी पड़ती थीं। इसी तरह तीन दिन बे-आब व दाना गुज़र गए।"
अल्लामा हसन रज़ा ख़ाँ रहमतुल्लाहि अलैह भी लिखते हैं:
"तीन दिन के प्यासों पर तीरों की बारिश शुरू हो गई।"
(आईना-ए-क़ियामत, सफ़्हा 65)
और अल्लामा जलालुद्दीन अमजदी रहमतुल्लाहि अलैह लिखते हैं:
"इब्ने सअद ने अम्र बिन हज्जाज को पाँच सौ सवारों के साथ दरियाए फ़ुरात पर मुक़र्रर कर दिया ताकि इमाम और उनके साथी पानी की एक बूँद भी न ले सकें, और यह वाक़िआ इमाम की शहादत से तीन दिन पहले का है।"
(ख़ुत्बाते मुहर्रम, सफ़्हा 352)
ये वे इबारतें हैं जिनसे यह मालूम होता है कि तीन दिन पानी बंद रहा।
बल्कि इमामे अहले सुन्नत को छोड़कर बाकी तीनों बुज़ुर्गों ने कई जगह लिखा है कि ख़ेमे में एक बूँद पानी भी नहीं था।
हम इस बात का इकरार करते हैं कि ये हमारे बुज़ुर्ग हैं और हम इल्म व मर्तबे में उनके क़दमों की उड़ती हुई धूल तक नहीं पहुँच सकते।
लेकिन हक़ीक़त यह है कि "एक बूँद पानी भी नहीं था" यह बात किसी भी मुअतबर किताब में नहीं लिखी गई और न ही इन बुज़ुर्गों ने इसका कोई हवाला दिया है।
जब किसी रिवायत का दारोमदार सनद पर हो तो सिर्फ़ किसी बड़े बुज़ुर्ग के लिख देने से वह रिवायत सहीह नहीं हो जाती।
ख़ुद इमामे अहले सुन्नत फ़रमाते हैं:
"जब दारोमदार रिवायत पर हो तो सहीह सनद दरकार होगी। किसी वली या मुअतमद शख़्स का किसी ग़ैर मुअतमद हिकायत को नक़्ल कर देना उस रिवायत को सहीह और वाजिबुल-एतिमाद नहीं बना देता।"
इसलिए सिर्फ़ किसी बुज़ुर्ग के लिख देने से यह साबित नहीं होता कि कर्बला में एक बूँद भी पानी नहीं था।
आला हज़रत ने इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाहि अलैह की मिसाल देते हुए फ़रमाया कि उन्होंने अपनी किताब इह्या उलूमिद्दीन में कुछ मौज़ू रिवायतें लिख दीं, लेकिन उनका लिख देना उन रिवायतों को मुअतबर नहीं बना देता।
इससे मालूम हुआ कि इल्म में महारत अपनी जगह, लेकिन जब मसला रिवायत और तारीख़ का हो तो सनद और तहक़ीक़ ज़रूरी होती है।
तीन दिन पानी बंद होने की अस्ल बुनियाद
अल्लामा जलालुद्दीन अमजदी रहमतुल्लाहि अलैह ने जिस इबारत का हवाला दिया है, वही अस्ल बुनियाद है:
"अगर हुसैन यज़ीद की बैअत न करें तो उन्हें और उनके साथियों को पानी लेने से रोक दिया जाए। इसके बाद उमर बिन सअद ने अम्र बिन हज्जाज को पाँच सौ सवारों के साथ फ़ुरात पर तैनात कर दिया और यह वाक़िआ इमाम की शहादत से तीन दिन पहले का है।"
(अल-कामिल फ़ित्तारीख़, जिल्द 3, सफ़्हा 413)
हमारे बुज़ुर्गों ने इसी से यह नतीजा निकाला कि तीन दिन पानी बंद रहा।
लेकिन इस इबारत से यह नतीजा निकालना कि लगातार तीन दिन एक क़तरा पानी भी नहीं मिला, सहीह नहीं है।
क्योंकि इसमें सिर्फ़ यह लिखा है कि पानी पर पहरा शहादत से तीन दिन पहले लगाया गया। इससे यह लाज़िम नहीं आता कि लगातार तीन दिन पूरी तरह पानी बंद रहा।
बल्कि अल-कामिल ही में आगे यह भी लिखा है कि आशूरा के दिन जब हज़रत ज़ैनब रज़ियल्लाहु अन्हा बेहोश होकर गिर पड़ीं तो इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने उनके चेहरे पर पानी छिड़का:
"फ़सब्बल माअ अला वज्हिहा"
(अल-कामिल, सफ़्हा 417)
अगर तीन दिन तक बिल्कुल पानी नहीं था तो यह पानी कहाँ से आया?
यही वजह है कि दोनों रिवायतों में तात्बीक़ दी जाएगी।
या तो यह कहा जाएगा कि शुरू में सख़्ती थी, बाद में कम हो गई۔
या यह कहा जाएगा कि फ़ुरात पर पहरा था लेकिन इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु ने कुएँ खोदे थे और ज़मीन से पानी निकाला जाता था।
इसी तरह हज़रत अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु का बीस मश्कें पानी लाने का वाक़िआ भी तारीख़ की किताबों में मौजूद है।
इसलिए यह कहना कि तीन दिन तक बिल्कुल पानी नहीं था, सहीह नहीं।
फिर हमारे बुज़ुर्गों ने ऐसा क्यों लिखा؟
इसका जवाब यह है कि हमारे ये अकाबिर दीन के बहुत बड़े ख़ादिम और उलेमा थे। उन्होंने क़ुरआन, हदीस, फ़िक़्ह और दूसरे उलूम में बड़ी ख़िदमात अंजाम दीं।
लेकिन तारीख़ उनका अस्ल मैदान नहीं था।
इसलिए उन्होंने तारीख़ी इबारतों के ज़ाहिर पर एतमाद करके लिख दिया।
अगर कोई उनसे सवाल करता और दूसरी इबारतें सामने रखता तो वह यक़ीनन तहक़ीक़ फ़रमाते और उसका जवाब देते।
ख़ुद आला हज़रत से जब हज़रत मुस्लिम बिन अकील रज़ियल्लाहु अन्हु के बच्चों के बारे में सवाल किया गया तो आपने फ़रमाया:
"न मुझे इस वक़्त याद है, न तारीख़ देखने की फ़ुर्सत है और न इस सवाल की ज़रूरत।"
(फ़तावा रज़विया, जिल्द 24, सफ़्हा 510)
इससे मालूम होता है कि उन हज़रात की मसरूफ़ियात इतनी ज़्यादा थीं कि हर तारीख़ी वाक़िए की तहक़ीक़ के लिए अलग वक़्त निकालना आसान नहीं था।
इसलिए हमारे इन बुज़ुर्गों पर कोई एतराज़ नहीं किया जा सकता।
ख़ुलासा
हमने वाक़िआत-ए कर्बला में मौजूद मनगढ़ंत और ग़ैर-मुसन्नद रिवायतों की निशानदेही की है। बरसों से यह रिवायतें बयान की जाती रही हैं। अल्लाह तआला ने हमें उनकी तहक़ीक़ की तौफ़ीक़ दी।
हमारा मक़सद किसी बुज़ुर्ग की तन्क़ीस नहीं, बल्कि उम्मते मुस्लिमा को ग़लत और बे-अस्ल वाक़िआत से बचाना है।
अगर हमारी यह तहक़ीक़ सहीह है तो यह अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ़ से तौफ़ीक़ है, और अगर इसमें कोई ख़ता है तो वह हमारी कम इल्मी और मुतालआ की कमी की वजह से है।
अल्लाह तआला हमारी इस कोशिश को क़बूल फ़रमाए, हमारी मग़फ़िरत फ़रमाए और इसे हिदायत का ज़रिया बनाए।
(कर्बला की तहक़ीक़ व तर्दीद)
मुतर्जिम: दारुल इफ्ता गुलज़ारे तैयबा टीम
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