आशूरा के दिन की तहक़ीक़
(आशूरा के दिन अर्श, लौह, क़लम बनाए गए? आशूरा के दिन की फ़ज़ीलत के बारे में वारिद रिवायतों की तहक़ीक़)
आशूरा के दिन की फ़ज़ीलत के बारे में जो सहीह रिवायतें वारिद हुई हैं, हम उन पर कोई कलाम नहीं करेंगे। ज़ाहिर सी बात है कि उन पर कलाम करना भी नहीं बनता। हम उन रिवायतों का ज़िक्र करेंगे जिन पर हमारे मुहद्दिसीन ने कलाम किया है और उन्हें मौज़ू (गढ़ी हुई) क़रार दिया है। क्योंकि बहुत सी रिवायतें शियाओं के रद्द में गढ़ी गईं और बहुत सी शियाओं ने ख़ुद गढ़ीं।
एक रिवायत में बयान किया जाता है कि हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तौबा इसी दिन क़बूल हुई, हज़रत आदम की मुलाक़ात हज़रत हव्वा से इसी दिन हुई, हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम मछली के पेट से इसी दिन बाहर आए, हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती इसी दिन ठहरी, हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के लिए फ़िदया इसी दिन आया, इसी दिन हज़रत आदम अलैहिस्सलाम पैदा हुए, इसी दिन जन्नत में दाख़िल हुए, आशूरा के दिन ही अर्श, कुर्सी, आसमान, ज़मीन, सूरज, चाँद, सितारे और जन्नत को पैदा किया गया, आशूरा के दिन ही हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को आसमान पर उठा लिया गया, हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम की बीनाई लौटाई गई, हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को कुएँ से निकाला गया, आसमान से पहली बारिश हुई और एक रिवायत में यह भी आया है कि हुज़ूर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत भी इसी दिन हुई।
इस रिवायत के बारे में हमारे मुहद्दिसीन ने इसे मौज़ू और मनगढ़ंत क़रार दिया है। इस पर मैं तफ़्सीली कलाम करूँगा।
लेकिन इससे पहले यह जान लीजिए कि फ़िरऔन का दरिया में ग़र्क होना और हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती का जूदी पहाड़ पर ठहरना सहीह रिवायतों से साबित है। इसलिए यह तास्सुर न लिया जाए कि हम इनके भी मुनकिर हैं।
आशूरा की फ़ज़ीलत में जो यह रिवायत बयान की जाती है, यह दो रिवायतें हैं। एक हज़रत अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु की तरफ़ मंसूब है और दूसरी हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा की तरफ़ मंसूब है। यह दोनों रिवायतें मौज़ू और मनगढ़ंत हैं। इन्हें गढ़कर दोनों सहाबा की तरफ़ मंसूब कर दिया गया है। इसकी सनद में झूठे और कज़्ज़ाब रावी मौजूद हैं जिन्होंने हदीस गढ़कर सहाबा की तरफ़ मंसूब कर दी।
इन रिवायतों को मुहद्दिसीन ने अपनी किताबों में मौज़ूआत के तहत ज़िक्र किया है।
इमाम इब्ने जौज़ी रहमतुल्लाहि अलैह अपनी किताब अल-मौज़ूआत में फ़रमाते हैं:
"एक जाहिल क़ौम ने अहले सुन्नत का मज़हब अपनाया और राफ़िज़ियों को ग़ुस्सा दिलाने के लिए आशूरा की फ़ज़ीलत में हदीसें गढ़ लीं। हम दोनों फ़रीक़ों से बरी हैं। आशूरा के बारे में सहीह रिवायत सिर्फ़ रोज़े के बारे में वारिद हुई है।"
फिर इमाम इब्ने जौज़ी उन गढ़ी हुई रिवायतों को नक़्ल करते हैं जिनमें आदम अलैहिस्सलाम की तौबा, इदरीस अलैहिस्सलाम का बुलंद मक़ाम, इब्राहीम अलैहिस्सलाम की आग से निजात, नूह अलैहिस्सलाम की कश्ती, मूसा अलैहिस्सलाम पर तौरेत का नुज़ूल, इस्माईल अलैहिस्सलाम का फ़िदया, यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की रिहाई, याक़ूब अलैहिस्सलाम की बीनाई, अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीमारी का ख़ात्मा, यूनुस अलैहिस्सलाम का मछली के पेट से निकलना और हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अगले-पिछले गुनाहों की माफ़ी जैसी बातें बयान की गई हैं।
इसी तरह दूसरी रिवायत में यह भी लिखा गया कि:
"नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत आशूरा के दिन हुई।"
इसके बाद इमाम इब्ने जौज़ी फ़रमाते हैं:
"यह हदीस बिला शुब्हा मौज़ू (गढ़ी हुई) है।"
इमाम अहमद बिन हंबल फ़रमाते हैं:
"हबीब बिन अबी हबीब झूठ बोलता था।"
इब्ने अदी फ़रमाते हैं:
"वह हदीसें गढ़ता था।"
अबू हातिम और इब्ने हिब्बान फ़रमाते हैं:
"यह हदीस बातिल है, इसकी कोई अस्ल नहीं।"
इब्ने हिब्बान फ़रमाते हैं:
"हबीब बिन अबी हबीब सिक़ा रावियों पर हदीसें गढ़कर मंसूब करता था। उसकी हदीस लिखना जायज़ नहीं, मगर उसकी जर्ह और तन्क़ीद के लिए।"
इमाम इब्ने जौज़ी आगे फ़रमाते हैं:
"इस हदीस के गढ़े हुए होने में किसी अक़्लमंद को शक नहीं हो सकता।"
उन्होंने यह भी फ़रमाया कि रिवायत में कहा गया कि सबसे पहला दिन जो अल्लाह ने पैदा किया वह आशूरा का दिन था, जबकि "आशूरा" दसवें दिन को कहा जाता है और उससे पहले नौ दिन गुज़र चुके होते हैं। यह बात ही उसके गढ़े हुए होने की दलील है।
इमाम ज़हबी रहमतुल्लाहि अलैह ने भी हबीब बिन अबी हबीब को हदीसें गढ़ने वाला बताया और आशूरा वाली लंबी रिवायत को मौज़ू क़रार दिया।
इसी तरह हाफ़िज़ इब्ने हजर अस्क़लानी रहमतुल्लाहि अलैह ने तहज़ीबुत तहज़ीब, लिसानुल मीज़ान और तक़रीबुत तहज़ीब में इस रावी को झूठा और हदीसें गढ़ने वाला बताया है।
मेरे नज़दीक आशूरा वाली इस रिवायत के मौज़ू होने के लिए इतना काफ़ी है कि इतने बड़े-बड़े मुहद्दिसीन ने इसे मौज़ू कहा है और उसके रावी को कज़्ज़ाब व वज़्ज़ा-उल-हदीस बताया है।
इसके अलावा यह रिवायत सहीह मुस्लिम की हदीस के भी ख़िलाफ़ है, जिसमें बयान हुआ है कि अल्लाह तआला ने ज़मीन, पहाड़, दरख़्त, नूर, जानवर और आख़िर में हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को अलग-अलग दिनों में पैदा फ़रमाया।
आशूरा वाली रिवायत में यह भी कहा गया कि हज़रत आदम और हज़रत हव्वा की मुलाक़ात आशूरा को हुई, जबकि मशहूर है कि उनकी मुलाक़ात ज़िलहिज्जा में हुई और उसी वजह से उस जगह का नाम अरफ़ात पड़ा।
इसी तरह अगर हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम का फ़िदया आशूरा को आया होता तो ईदुल अज़हा भी आशूरा को मनाई जाती।
और अगर नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत आशूरा को हुई होती तो जश्ने विलादत बारह रबीउल अव्वल के बजाय आशूरा को मनाया जाता।
अगर मैं इस रिवायत पर और तफ़्सील से कलाम करूँ तो एक पूरी किताब वजूद में आ जाएगी। इसलिए फिलहाल इतने पर इक्तिफ़ा करता हूँ।
यही वह दलीलें और तहक़ीक़ थीं जिनकी बुनियाद पर मैंने इस रिवायत को मौज़ू कहा था।
अफ़सोस कि कुछ जाहिल लोगों ने इस पर बहुत फ़साद किया। यहाँ तक कि कुछ मस्जिदों के इमामों ने भी मेरे ख़िलाफ़ मीटिंगें कीं। लेकिन मेरा कहना यह है कि मेरे ख़िलाफ़ लोगों को भड़काने के बजाय अगर इस रिवायत की तहक़ीक़ कर लेते तो ख़ुद उनके इल्म में भी इज़ाफ़ा होता और लोगों तक सही बात पहुँचती।
कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कह दिया कि:
"अगर उलमा किसी मौज़ू रिवायत पर अमल कर लें तो वह सही हो जाती है।"
मआज़ल्लाह!
हालाँकि इस बात पर सबका इत्तिफ़ाक़ है कि मौज़ू रिवायत को बयान करना हराम है।
आशूरा और वाक़िआ-ए कर्बला के बारे में बहुत सी रिवायतें शियाओं ने गढ़ी हैं और आज वे हमारे यहाँ भी बड़े शौक़ से बयान की जाती हैं। हमारे अकाबिर ने उनकी निशानदेही की है और हमने भी "वाक़िआत-ए कर्बला की तहक़ीक़ व तर्दीद" में उनका बयान किया है।
फ़तावा रज़विया में भी इसी वजह से कहा गया है कि वाक़िआ-ए कर्बला अगर सहीह रिवायतों के साथ बयान किया जाए तो जायज़ है, वरना हराम है।
अल्लाह तआला हमें हक़ को सुनने, समझने, क़बूल करने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
मुतर्जिम: दारुल इफ्ता गुलज़ारे तैयबा टीम
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